वाह ! ये हुई न बात ! चैम्पियंस ट्राफी में भारतीय टीम वाकई चैम्पियन की तरह खेली | कोई भी विरोधी टीम हो नतीजा हर बार भारत के पक्ष में रहा | बल्लेबाजी हो या गेंदबाजी या फील्डिंग , हर विभाग में टीम ने औरों से बेहतर खेल दिखाया | फील्डिंग की वजह से हर बार विपक्षी टीम ने ३० से ४० रन कम बनाए; जिसका नतीजा ये रहा की वो टीम भारत का मुकाबला नहीं कर पाई | सबसे अच्छी बात ये रही की हमारी बल्लेबाजी पूरे रंग में रही | भारतीय टीम ने हर खेल में अच्छे रन बनाए; हालांकि फाइनल मुकाबला इसका अपवाद रहा पर उस समय बारिश की वजह से जो व्यवधान हुआ उसके कारण भी कुछ कम रन बने क्योंकि बल्लेबाजी की लय बार-बार टूट रही थी | फिर भी गेंदबाजों ने हिम्मत नहीं हारी और अच्छे फील्डिंग के साथ ने रोमांचक मैच का निर्णय भारत के पक्ष में कर दिया | गोल्डन बैट के विजेता शिखर धवन, मैन ऑफ़ द मैच और गोल्डन बाल के विजेता रवीन्द्र जडेजा ने बेहतरीन खेल जारी रखा तथा फाइनल में विराट कोहली ने भी अच्छे हाथ दिखाए और मैच के बाद डांस का क्या कहना ! है न ! भारतीय टीम को चैम्पियंस ट्राफी जीतने की बहुत-बहुत बधाई...
Thursday, 27 June 2013
Tuesday, 25 June 2013
मानवता अब तार-तार है
मित्रों ! उत्तराखंड की घटना ने एक ऐसा घाव छोड़ा है जो शायद बरसों तक नहीं भर सकता | सबसे ज्यादा दुःख तो तब हुआ जब उस समय की कई घटनाओं के बारे में पता चला | कोई पानी बिना मर रहा था और कुछ लोग उस समय पानी का सौदा कर रहे थे और २०० रुपये अधिक दाम एक बोतल पानी का वसूल रहे थे | कुछ उस समय लाशों पर से गहने उतार रहे थे, और इसके लिए उन्होनें उन शवों की उंगलियाँ काटने से गुरेज नहीं किया | उनके सामने कई लोग मदद के लिए पुकार रहे थे मगर उन्होंने उन्हें अनसुना कर अपना काम जारी रखा | क्या हो गया है हमारे समाज को ? मानवता को ? कुछ पंक्तियाँ अपने–आप होंठ गुनगुनाते गए जिन्हें मैं आप को प्रेषित कर रहा हूँ |
बीते पल ये कहते गुजरे, संभलो आगे और पतन है |
लुटे हुए को लूट रहे हैं, मरे हुए को काट रहे हैं;
कुछ ऐसे हैं आफ़त में भी; रुपये, गहने छांट रहे हैं;
मरते रहे कई पानी बिन, वे अपने धंधे में मगन हैं......
जो शासक हैं देख रहे हैं, उनको बस अपनी चिंता है;
मरती है तो मर जाए ये, ये जनता है वो नेता हैं;
आग लगाने खड़े हुए हैं जनता ओढ़े हुए कफ़न है...
भर जाते हैं घाव बदन के, मन के जख्म नहीं भरते;
आफ़त ही ये ऐसी आई, करते भी तो क्या करते;
क्या वे फिर से तीर्थ करेंगे, उजड़ा जिनका ये जीवन है...
Friday, 21 June 2013
प्रकृति की महाविनाशलीला
उत्तराखण्ड में प्रकृति की महाविनाशलीला देखने को मिली। गाँव के गाँव बह गए, जाने कितनी जानें गयीं। जाने कितने बेजुबान पशु-पक्षी असमय काल-के गाल में समा गए। समाचार-चैनलों के दृश्य वीभत्स रस की निष्पत्ति कर रहे हैं। सेना और आईटीबीपी के जवान अपनी जान हथेली पर रखकर जिस तरह लोगों की जान बचा रहे हैं, उनके कार्य को शब्दों में बांधने की हिम्मत मैं नहीं करना चाहता; क्योंकि ये जवान इस समय भगवान से कम नहीं हैं। इस विनाश के लिए कौन जिम्मेदार है, इस समय यह चर्चा करने का उचित समय नहीं है, पर लापरवाही, बाँधों को बनाने में नियमों की अनदेखी, आपदा प्रबन्धन की विफलता से कई सवाल तो खड़े होते ही हैं। सबसे बड़ी समस्या इस बात की है कि इतनी बड़ी विनाशलीला के बाद भी हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सत्तारुढ़ और विपक्षी दलों के विभिन्न नेताओं का संवेदनहीन होकर एकदम चुप्पी साध लेना । होना तो ये चाहिए कि इस समय सभी मिलकर इस आपदा का सामना करते, तुरन्त आगे बढ़कर संवेदना दिखाते हुए कहीं नज़र आते; कुछ ऐसा कहते जिससे लोगों के जख्मों पर मरहम लगता, पर ऐसा नहीं हुआ । कई बार संवेदना के कुछ बोल बहुत असरकारक सिद्ध होते हैं, ऐसा लगता है कि कोई है जो हमारी खबर ले रहा है । जिनको इस घटना ने दर्द दिया है, उनका दर्द तो कोई दूर नहीं कर सकता पर उसे बांटने में ये कंजूसी क्यों है, ये समझ से परे है। दिवंगत सभी आत्माओं को श्रद्धांजलि और प्रभावित लोग पुनः सामान्य जीवन जी सकें, ऐसी कामना के साथ-साथ देश के उन वीर जवानों को सैल्यूट……जिनकी वजह से आज हजारों लोग जिन्दा हैं ।
Saturday, 16 February 2013
खूबसूरत दक्षिणी अभिनेत्रियाँ
मित्रों ! फिल्मी दुनियाँ में दक्षिणी अभिनेत्रियों का बोलबाला शुरु से रहा है। उनकी खूबसूरती के चर्चे हिन्दी फिल्म संसार में भी होते रहे हैं। वैजयन्ती-माला, वहीदा रहमान, हेमामालिनी, रेखा, श्रीदेवी, जयाप्रदा, माधुरी दीक्षित आदि अभिनेत्रियों ने हिन्दी फिल्मों के दर्शकों के दिलों पर राज किया है । आज भी श्रिया सरन, अनुष्का शेट्टी, असिन, तमन्ना, इलियाना, चार्मी, काजल अग्रवाल आदि हीरोइनें फिर से हिन्दी फिल्मों में वही मुकाम चाहती हैं जो कभी पुरानी अभिनेत्रियों ने पाया था। देखते हैं इनमें से कौन पूरे भारत के दर्शकों के दिलों पर राज कर पाती है।
अनुष्का शेट्टी
असिन
काजल अग्रवाल
चार्मी
Thursday, 27 December 2012
एक और हार...
आखिर एक और हार हो गयी। और वो भी पाकिस्तान से......क्या हो गया है हमारे सबसे सफल कप्तान को ? हर पासा उल्टा पड़ रहा है। जो भी चाल इस समय धोनी चल रहे हैं वह दांव हार जाते हैं। कुछ तो गड़बड़ जरूर है ( धारावाहिक " सी.आई.डी" के प्रद्युम्न की तरह)। है न ! लेकिन इसमें उनकी ख़ुद की गलतियाँ ज्यादा हैं। क्या जरूरत थी आठ-आठ बल्लेबाज खिलाने की ? क्या जरूरत पड़ गयी थी केवल तीन विशेषज्ञ गेंदबाजों को लेकर मैदान में उतरने की ? इतना सब किया तो किया पर क्या जरूरत थी आखिरी ओवर जडेजा से कराने की ? आखिरी ओवर के लिये पहले से कोई योजना क्यों नहीं बनी ? जडेजा पिछले दस मैचों में न तो बल्लेबाजी में चल रहें हैं न तो गेंदबाजी में। उन्होंनें दस मुकाबलों में केवल 18 रन बनाये हैं और केवल चार विकेट लिया है। फिर उन्हें खिलाने की जरूरत क्या है ? युसुफ पठान और इरफान पठान में से भी कोई होता तो इतने बुरे हालात नहीं होते। बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों की शुरुआत शानदार होते हुए भी हम मैच हार रहे हैं। क्यों ? क्या कोई जवाब मिलने वाला है ?
Wednesday, 19 December 2012
डंकन फ़्लेचर क्यों?
Photo from znn.india.com
दोस्तों ! भारतीय क्रिकेट आज जितना नीचे जा चुका है, वह किसी से छुपा नहीं है। लेकिन मूल कारण क्या है इस पर चर्चा बहुत ही कम होती है। वह कारण है भारतीय टीम का कोच। भारत ने विदेशी कोच रखने का जो सिलसिला प्रारम्भ किया है वह कुछ समय के लिये तो ठीक था परन्तु हमेशा के लिये ठीक नहीं है। सभी विदेशी कोच अच्छी नीयत के साथ भारत नहीं आते। इसका सबसे बढ़िया उदाहरण ग्रेग चैपल हैं। अपने कोच रहते ग्रेग चैपल अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि भारत की लुटिया पूरी तरह से डुबो दी जाए। टीम के सदस्यों में आपसी मनमुटाव को बढ़ावा देना, अच्छे खिलाड़ियों की गेंदबाजी या बल्लेबाजी बिगाड़ना, भारतीय क्रिकेट को रसातल में ले जाना इत्यादि ये सभी ग्रेग चैपल की प्राथमिकताएं थी जिसे काफी हद तक उन्होंने पूरा किया। अब यही काम डंकन फ्लेचर कर रहे हैं। गैरी कर्स्टेन इसके अपवाद थे और टीम का प्रदर्शन भी उस समय अच्छा था इसलिए वो बच गये। मेरे विचार से भारत का कोच किसी भारतीय को ही होना चाहिए क्योंकि भारतीय कोच ही यहाँ के खिलाड़ियों की भावना को और खेल में हार-जीत की वजह से पूरे भारत की जनता की भावना को समझ सकता है और उसका उपाय ढूंढ सकता है। विदेशी कोच तो बस पैसे के लिए यहाँ आते हैं और अपना उल्लू सीधा कर चलते बनते हैं, उनकी कोई जवाबदेही भी नहीं बनती। है कि नहीं ! आप का विचार क्या है ?
Saturday, 15 December 2012
वन-टू का फ़ोर, फ़ोर-टू का वन
मित्रों ! जैसे-जैसे समय बीत रहा है हम सभी ब्लागरों को ज्ञान प्राप्त हो रहा है कि कई-कई ब्लागों से अच्छा है एक ही ब्लाग होना। मैंने भी अब केवल दो ब्लाग रखने का फैसला किया है- एक अपनी रचनाओं के लिए और एक भारत के दूसरे विभिन्न रचनाकारों के लिए। अपने अन्य रचनाकारों के लिये मौजूद दो ब्लागों "समकालीन ग़ज़ल" और "बनारस के कवि और शायर" को मिलाकर एक ब्लाग मे समाहित कर मैंने ये ब्लाग "गीत,ग़ज़ल,कविता की दुनिया" बनाया है। सबसे पहले दोनो ब्लागों के पुराने पोस्ट मैंने इस पर पोस्ट किया है। आशा है आप को भी सुविधा होगी......
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